हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा: लक्ष्मण जी और गुरू गोबन्द सिंह जी की ध्यान स्थली

hemkundहेमकुंड का अर्थ है बर्फ और कुंड का अर्थ है कटोरा। हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा एक छोटे से स्टार के आकार का है तथा सिखों के अंतिम गुरू गुरु गोबिंद सिंह जी को समर्पित है। श्री हेमकुंड साहिब गुरूद्वारे के पास ही एक सरोवर है। इस पवित्र जगह को अमृत सरोवर अर्थात अमृत का तालाब कहा जाता है। यह सरोवर लगभग 400 गज लंबा और 200 गज चौड़ा है। यह चारों तरफ से हिमालय की सात चोटियों से घिरा हुआ है। इन चोटियों का रंग वायुमंडलीय स्थितियों के अनुसार अपने आप बदल जाता है। कुछ समय वे बर्फ सी सफेद कुछ समय सुनहरे रंग की कभी लाल रंग की और कभी-कभी भूरे नीले रंग की दिखती हैं।
हेमकुंड साहिब समुद्र स्तर से 4329 मीटर की ऊचांई पर स्थित है। सिखों के पवित्र तीर्थ हेमकुंड साहिब और झील चारों तरफ बर्फ से ढकी सात पहाड़ियों से घिरे हुए हैं। झील के चट्टानी किनारे वर्ष के अधिकांश समय बर्फ के साथ ढके रहते हैं लेकिन जब बर्फ पिघल जाती है तो यहां पौराणिक पीले व हरे ब्रह्मा कमल चट्टानों पर उग आते हैं । यह स्थान अपनी अदम्य सुंदरता के लिए जाना जाता है और यह सबसे महत्वपूर्ण गुरूद्वारों में से एक है। यह पवित्र स्थल गुरु गोबिंद सिंह जी के यहां आने से पहले भी तीर्थ माना गया है। इस पवित्र स्थल को पहले लोकपाल जिसका अर्थ है विश्व के रक्षक कहा जाता था।
 इस जगह को रामायण के समय से मौजूद माना गया है। कहा जाता है कि लोकपाल वही जगह है जहां श्री लक्ष्मण जी अपना मनभावन स्थान होने के कारण ध्यान पर बैठ गए थे। कहा जाता है कि अपने पहले के अवतार में गोबन्द सिंह जी ध्यान के लिए यहां आए थे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा ‘बिचित्र नाटक’ में इस जगह के बारे में अपने अनुभवों का उल्लेख किया है।
हेमकुंड साहिब गुरूद्वारा के कपाट खुलते हैं तो उत्साहित श्रद्धालुओं के ‘जो बोले सो निहाल संत श्री अकाल’ के नारों से पूरा तीर्थ स्थल गुंजायमान हो जाता है। यात्रा शुरू होने के बाद अब तीर्थयात्रियों की आवाजाही शुरू होती है। यहां पर भारी बर्फबारी होती है। जब भी यात्रा शुरू होती है वहां बर्फ जमी हुोती है। बर्फ हटाने का काम कई दिनों पहले ही शुरू हो जाता है।  कई जगह आपदा से रास्ते ध्वस्त हो जाते हैं। उन्हें दुरूस्त किया जाता है।

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